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मां महामाया मंदिर, रतनपुर की कृपा से असंभव भी संभव हो जाते हैं। 

  • समाचार का दिनांक :13-08-2022 379 Views
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बिलासपुर{ बालक भगवान }|मेरा अपना अनुभव हैं कि बिना ईश्वर के आशीर्वाद से कोई भी कार्य पूर्ण नही होता हम लोग कितना भी प्लानिंग कर ले मगर ईश्वर के आर्शीवाद के बिना कुछ भी संभव नहीं हैं, इस जगत में माया की लीला अपरम्पार हैं उसमे से अगर मां महामाया की कृपा हो तो असंभव से भी संभव कार्य हो जाते हैं। जहां जहां राजा का किला रहा हैं वहां वहां पर जगदजननी मां महामाया मंदिर मिलेगा। 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर रतनपुर में स्थापित मां महामाया मंदिर में देवी के महालक्ष्मी जी रूप के दर्शन होते हैं। यह मंदिर एक 1100 साल पुराना है, जहां देश ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश स्थापित कराते हैं। 

मंदिर का निर्माण वर्ष 1042 ई. में राजा रत्नदेव प्रथम ने करवाया था। यह बलुवा पत्थर से नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर के परकोटे से लेकर गुंबज तक पत्थरों में खूबसूरत कलाकृतियां उकेरी गई हैं। शुरुआत में देवी के तीन रूप महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की स्थापना देवीपुराण और दुर्गासप्तशती के अनुसार की गई थी। 

11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक देवी के तीनों की पूजा होती थी। इसके बाद राजा भारसाय ने महाकाली की पूजा बंद करवा दी और मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार महाकाली की प्रतिमा कोलकाता में स्थापित की गई। 15वीं शताब्दी के बाद से लेकर आज तक मंदिर में मां के दो स्वरूप महालक्ष्मी और महासरस्वती के ही दर्शन होते हैं। महामाया नाम मां लक्ष्मी का ही एक नाम है जिसका माहा+माया = महामाया जिसकी माया अपरम्पार है कलयुग में माया का मतलब पैसा और धन से हैं। 

मंदिर के सूत्रों ने बताया कि आज भले ही मां के दो स्वरूप के दर्शन होते हैं लेकिन मां के तीनों रूपों में प्रतिदिन पूजन होता है और भक्तों को मां की तीनों शक्ति का आशीष मिलता है। मंदिर में 1100 सालों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। बस विस्तार के रूप में हॉल, धर्मशाला, मंदिर परिसर सहित अन्य निर्माण किए गए हैं। 

मान्यता है कि देवी सती का इस स्थान पर दाहिना कंधा गिरा था। इस वजह से कौमारी शक्तिपीठ है। शक्तिपीठ मानने के पीछे भी एक मान्यता है कि जहां देवी मंदिर के साथ भैरवजी द्वारपाल के रूप में विराजित होते हैं वह स्थान शक्तिपीठ कहलाता है। इस वजह से मां महामाया देवी शक्तिपीठ के रूप में है। इसके साथ ही मान्यता है कि मां की साड़ी महिलाएं और युवतियां प्रसाद के रूप में खरीदकर ले जाती हैं। इससे मां का आशीष मिलता है और मनोकामना पूर्ण होती है। वहीं विवाह में होने वाला विलंब भी दूर होता है। 

मां महामाया का साल में तीन बार राजसी श्रृंगार किया जाता है। इसमें अश्विन व चैत्र नवरात्रि और दीपावली में 3 किलो वजन के स्वर्ण आभूषणों से राजसी श्रृंगार किया जाता है। रानी हार, कंठी हार, मोहर हार, नथ, मुकुट, छत्र, करन, कानों के कुंडल सहित 16 स्वर्ण श्रृंगार के आभूषण हैं। 

मंदिर ट्रस्टी के अनुसार कि मां महामाया में नवरात्रि पर 30 हजार मनोकामना ज्योतिकलश स्थापित होते हैं। इसमें विदेशों से बड़ी संख्या में भक्त और देश के प्रसिद्ध व्यक्ति भी ज्योतिकलश स्थापित कराते हैं। आजीवन कलश की संख्या 400 से बढ़कर 1200 हो गई है। इतनी बड़ी संख्या में ज्योति कलश स्थापित होने की वजह से यह वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल है।


मां महामाया का श्रृंगार पूर्ण रूप से प्रतिदिन शास्त्रीय पद्धति से किया जाता है। इसके साथ ही साड़ी का रंग और फूलों की माला का रंग भी दिन के अनुसार होता है। मां को पूर्ण रूप से श्वेत और काली साड़ी नहीं पहनाई जाती। इसकी जगह हल्के और गहरे नीले रंग को स्थान दिया जाता है। मां महामाया को सिर्फ चौड़े बार्डर की बनारसी साड़ी ही पहनाई जाती है जो बनारस से खास तौर पर मंगवाई जाती है। 

जल्द ही श्री सत्य सनातन धर्म की रक्षा एवम् प्रसार प्रसार व सनातन संपत्तियो की रक्षा हेतु " श्री बालक भगवान सेवा समिति" , रायपुर, छत्तीसगढ़ का गठन किया गया है, जो व्यक्ति भी समय दान दे सकते है संपर्क करें। हमारी योजना है कि छत्तीसगढ़ के सभी मठ मंदिरों का व्यापक प्रसार करे और उनके संवर्धन व संरक्षण में कार्य किया जावेगा।

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