आखिरी सावन सोमवार शिव की विशेष पूजा, जानें तिथि और शुभ मुहूर्त
- समाचार का दिनांक :07-08-2022 280 Views
रायपुर { बालक भगवान }| चतुर्मास का पहला महीना समाप्ति की ओर है. श्रावण मास 12 अगस्त को समाप्त हो जाएगा है. हिन्दू धर्म में श्रावण मास का बहुत महत्व है. भगवान शिव को समर्पित इस पवित्र मास में महादेव की विशेष पूजा की जाती है. सावन सोमवार के दिन शिवभक्त उपवास का पालन भी करते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और अच्छे जीवनसाथी की तलाश कर रहे युवक-युवतियों को शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं. बता दें कि श्रावण मास के आखिरी सोमवार के दिन अत्यंत शुभ योग का निर्माण हो रहा है. आइए जानते हैं किस दिन है सावन का आखिरी सोमवार और इस दिन कौन सा संयोग बन रहा है.
श्रावण मास का चौथा और आखिरी सोमवार 8 अगस्त को है. इस दिन एकादशी तिथि है और रवि योग का निर्माण हो रहा है. रवि योग में भगवान शिव की पूजा करने से कई प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं और महादेव की कृपा सदैव बनी रहती है. इस दिन तीन उत्तम संयोग भी बन रहे हैं जिस वजह से सावन के आखिरी सोमवार का महत्व अधिक बढ़ जाता है.
चौथा सावन सोमवार तिथि: 8 अगस्त 2022
एकादशी तिथि प्रारंभ: 7 अगस्त 2022 रात 11:50 से
एकादशी तिथि समापन: 8 अगस्त 2022, रात 9:00 तक
रवि योग: 8 अगस्त 2022, सुबह 05:46 से दोपहर 02:37 बजे तक
सावन सोमवार 2022 पूजा विधि
• सावन मास के आखिरी सोमवार के दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा की जाएगी. एकादशी तिथि होने के कारण इस दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाएगी.
• सुबह उठकर स्नान-ध्यान कर लें और शिव मंदिर में भगवान शिव का विधिवत जलाभिषेक करें. इस बाद पुष्प, बेलपत्र और भोग अर्पित करें.
• भगवान शिव की पूजा के बाद भगवान विष्णु की उपासना करें और उन्हें पीले फूल अर्पित करें. विधि-विधान से पूजा के बाद घी का दीपक जलाएं और विष्णुसहस्रनाम पाठ का जाप जरूर करें.
भगवान शिव तुरंत और तत्काल प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसीलिए उन्हें आशुतोष कहा जाता है। आइए जानते हैं ।
भगवान शिव को प्रिय 11 ऐसी सामग्री जो अर्पित करने से भोलेनाथ हर कामना पूरी करते हैं। यह 11 सामग्री हैं : जल, बिल्वपत्र, आंकड़ा, धतूरा, भांग, कर्पूर, दूध, चावल, चंदन, भस्म, रुद्राक्ष .....
1.जल : शिव पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ही स्वयं जल हैं शिव पर जल चढ़ाने का महत्व भी समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। अग्नि के समान विष पीने के बाद शिव का कंठ एकदम नीला पड़ गया था। विष की ऊष्णता को शांत करके शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिव पूजा में जल का विशेष महत्व है।
2.बिल्वपत्र : भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक है बिल्वपत्र। अत: तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र शिव जी को अत्यंत प्रिय है। प्रभु आशुतोष के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। ऋषियों ने कहा है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक समान है। भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक है बिल्वपत्र।
3.भांग : शिव हमेशा ध्यानमग्न रहते हैं। भांग ध्यान केंद्रित करने में मददगार होती है। इससे वे हमेशा परमानंद में रहते हैं। समुद्र मंथन में निकले विष का सेवन महादेव ने संसार की सुरक्षा के लिए अपने गले में उतार लिया। भगवान को औषधि स्वरूप भांग दी गई लेकिन प्रभु ने हर कड़वाहट और नकारात्मकता को आत्मसात किया इसलिए भांग भी उन्हें प्रिय है। भगवान् शिव को इस बात के लिए भी जाना जाता हैं कि इस संसार में व्याप्त हर बुराई और हर नकारात्मक चीज़ को अपने भीतर ग्रहण कर लेते हैं और अपने भक्तों की विष से रक्षा करते हैं।
4.कर्पूर : भगवान शिव का प्रिय मंत्र है कर्पूरगौरं करूणावतारं.... यानी जो कर्पूर के समान उज्जवल हैं। कर्पूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती है। भगवान भोलेनाथ को इस महक से प्यार है अत: कर्पूर शिव पूजन में अनिवार्य है।
5.दूध: श्रावण मास में दूध का सेवन निषेध है। दूध इस मास में स्वास्थ्य के लिए गुणकारी के बजाय हानिकारक हो जाता है। इसीलिए सावन मास में दूध का सेवन न करते हुए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है।
6.चावल : चावल को अक्षत भी कहा जाता है और अक्षत का अर्थ होता है जो टूटा न हो। इसका रंग सफेद होता है। पूजन में अक्षत का उपयोग अनिवार्य है। किसी भी पूजन के समय गुलाल, हल्दी, अबीर और कुंकुम अर्पित करने के बाद अक्षत चढ़ाए जाते हैं। अक्षत न हो तो शिव पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। यहां तक कि पूजा में आवश्यक कोई सामग्री अनुप्लब्ध हो तो उसके एवज में भी चावल चढ़ाए जाते हैं।
7.चंदन : चंदन का संबंध शीतलता से है। भगवान शिव मस्तक पर चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं। चंदन का प्रयोग अक्सर हवन में किया जाता है और इसकी खुशबू से वातावरण और खिल जाता है। यदि शिव जी को चंदन चढ़ाया जाए तो इससे समाज में मान सम्मान यश बढ़ता है।
8.भस्म : इसका अर्थ पवित्रता में छिपा है, वह पवित्रता जिसे भगवान शिव ने एक मृत व्यक्ति की जली हुई चिता में खोजा है। जिसे अपने तन पर लगाकर वे उस पवित्रता को सम्मान देते हैं। कहते हैं शरीर पर भस्म लगाकर भगवान शिव खुद को मृत आत्मा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार मरने के बाद मृत व्यक्ति को जलाने के पश्चात बची हुई राख में उसके जीवन का कोई कण शेष नहीं रहता। ना उसके दुख, ना सुख, ना कोई बुराई और ना ही उसकी कोई अच्छाई बचती है। इसलिए वह राख पवित्र है, उसमें किसी प्रकार का गुण-अवगुण नहीं है, ऐसी राख को भगवान शिव अपने तन पर लगाकर सम्मानित करते हैं। एक कथा यह भी है कि पत्नी सती ने जब स्वयं
को अग्नि के हवाले कर दिया तो क्रोधित शिव ने उनकी भस्म को अपनी पत्नी की आखिरी निशानी मानते हुए तन पर लगा लिया, ताकि सती भस्म के कणों के जरिए हमेशा उनके साथ ही रहे।
9.धतूरा : भगवान शिव को धतूरा भी अत्यंत प्रिय है। इसके पीछे पुराणों मे जहां धार्मिक कारण बताया गया है वहीं इसका वैज्ञानिक आधार भी है। भगवान शिव को कैलाश पर्वत पर रहते हैं। यह अत्यंत ठंडा क्षेत्र है जहां ऐसे
10.भांग : शिव हमेशा ध्यानमग्न रहते हैं। भांग ध्यान केंद्रित करने में मददगार होती है। इससे वे हमेशा परमानंद में
11.कर्पूर : भगवान शिव का प्रिय मंत्र है कर्पूरगौरं करूणावतारं.... यानी जो कर्पूर के समान उज्जवल हैं। कर्पूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती है। भगवान भोलेनाथ को इस महक से प्यार है अत: कर्पूर शिव पूजन में अनिवार्य है।