आय-व्यय
ब्यौरा

मार्गदर्शन



पूजा करने के बाद भगवान को भोजन.हवन के माध्यम से देते हैं। हवन में बहुत प्रकार की जड़ी बूटी के साथ अक्षत तिल जवां और घी भी मिलाते हैं। खीर पूड़ी भी हवन में डाला जाता है। साबूत सूखा नारियल या फिर नारियल का भेला साबूत डालते हैं। पर इस साबूत नारियल में एक छेद करके गाय का शुद्ध घी डाल देते हैं। यह सब जलने के बाद शूक्ष्म कण में बदल जाते हैं यही शूक्ष्म कण भगवान का भोजन है, इसे वे स्वीकार करते हैं। यह उन तक पहुँच जाता है। आत्मा रुपी शूक्ष्म जीवों का भी यही भोजन है। यह वातावरण में घूमने वाले शूक्ष्म जीवों का भी भोजन है। देव कौन हैं ,महादेव कौन हैं इन सबके बारे में जीवनविद्या में अच्छे से समझाया गया है। यही वे जीव हैं जो इसे ग्रहण करते हैं। खराब बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं । इससे वातावरण शुद्ध हो जाता है। हवन रोज करना चाहिये। पहले चुल्हे पर खाना बनता था तो हमारी माँ थोड़ा सा भात कृष्णार्पण कह कर अग्नी में डाल देती थी। यही अग्नी देव का भोजन है और इसके शूक्ष्म रूप को आकाश में रहने वाले सभी जीवाणु ग्रहण करते हैं। हवन के लिये लकड़ी कौन सी लें? वैसे गाय के गोबर के कंडे से भी हवन कर सकते हैं। नवग्रहों के लिए अलग-अलग लकड़ी का माहात्म्य है. सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मंगल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु को दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा शास्त्रों में कही गई है. मदार की समिधा रोग का नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) के काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली है. अलग-अलग ऋतुओं के अनुसार समिधा भी अलग प्रयोग करना चाहिए, ऋतु अनुसार लकड़ी की उपयोगिता सिद्ध है. वसन्त के लिए शमी, ग्रीष्म के लिए पीपल, वर्षा ऋतु में ढाक या विल्व की लकड़ी, शरद ऋतु में पाकड़ या आम की लकड़ी, हेमंत में खैर व शिशिर ऋतु में गूलर या बड़ की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है. गाय के गोबर के उपलों को जलाने पर भी वातावरण से जीवाणुओं का नाश होता है. हवन से वातावरण शुद्ध होता है और बैक्टीरिया खत्म होते हैं एक अनुसंधानिक रिपोर्ट के अनुसार फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर शोध के दौरान पाया, जब आम की लकड़ी जलती है तो फार्मिक एल्डिहाइड गैस उत्पन्न होती है जो खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्ध करती है. इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका ध्यान में आया. प्रायः गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है. आम की लकड़ी को इसी कारण मुख्यतः हवन में उपयोग किया जाता है. टौटीक नाम के वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी रिसर्च में पाया, आधे घंटे हवन में बैठने पर अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क होने पर टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर एवं वातावरण दोनों शुद्ध हो जाते हैं. राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी शास्त्रों में वर्णित हवन सामग्री से प्रयोग कर पाया कि ये विषाणुओं का नाश करती हैं. उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि एक किलो आम की लकड़ी जलने से हवा में उपस्थित विषाणु कम हुए परन्तु जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी, एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 फीसदी कम हो गया. यही नहीं उन्होंने कक्ष की हवा में उपस्थित जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया की कक्ष के दरवाज़ा खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 % कम था. बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था. यह रिपोर्ट एथनो फार्माकोलोजी के शोध पत्र (Resarch Journal Of Ethnopharmacology 2007) में दिसंबर 2007 में छप चुकी है. रिपोर्ट में लिखा गया की हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों, फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है, जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है. उपरोक्त तथ्यों का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि हमारे प्राचीन कर्म-कांड मूलतः वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित और समाजोपयोगी हैं. प्रतिदिन घर में हवन करने से अनेक रोगों से बचा जा सकता है. हवन करने की विधि एकदम आसान है, केवल 10 मिनट में यह कार्य संपन्न हो जाता है। खर्च भी ज्यादा नहीं.है। इसे अंधविश्वास की नजर से नहीं देखना चाहिये इसके वैज्ञानिक तथ्यों को समझना चाहिये l
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