कहानियां


क्या बालक भगवान एक अवतार थे ?

          सनातन विचारधारा के अनुसार हम शरीर नहीं आत्मा हैं । शरीर तो बस एक साधन है , वाहन हैं , वस्त्र है । गीता में श्री कृष्ण ने कहा है -

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय , नवानि गृहणाति नरोऽपराणि ।
यथा शरीराणि विहायजीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।

          मानव पुराने कपड़े को उतारकर जैसे नया कपड़ा धारण कर है , वैसे ही जीवात्मा जीर्ण शरीर को त्यागकर नया शरीर प्राप्त कर लेता है । जीवात्मा क्या है ? इसके उत्तर में गीता पुनः कहती है कि -
यो मां पश्याति सर्वत्र । सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि , स च मे न प्रणश्यति ।

          अर्थात् जो पुरुष संपूर्ण भूतों में सबके आत्मा रूप मुझ वासुदेव को ही देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है , उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता , और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ।

          इस श्लोक से स्पष्ट विदित होता है कि ईश्वर ही आत्मा के रूप में शरीर में विद्यमान है । सृष्टि की रचना का रहस्य भी यही दर्शाता है । जब सर्वत्र शून्य था , तब ब्रह्म में स्फूरणा हुई - " एकोऽहं बहुस्यामि ' अर्थात् मैं एक से अनेक में परिवर्तित हो जाऊँ । उनकी इस भावना के साथ ही यह सृष्टि बनी , अर्थात् जो कुछ भी पदार्थ या प्राणी दृश्यमान - वह ब्रह्म ही है । इस अर्थ में हम सब ईश्वरावतार ही हैं , पर सामान्य से हटकर जिस महामानव में भगवता के , अतिमानवीयता के हमें दर्शन होते हैं , उन्हें ही हम अवतार या अंशावतार का नाम देते हैं । बालक भगवान् में एक अवतारी पुरुष के प्रायः सभी लक्षण विद्यमान थे । भक्तों के कुछ अनुभव और बालक भगवान् की उन अनुभवों पर मौन या स्पष्ट स्वीकृति उन्हें अवतार मानने को बाध्य करती है । नीचे कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं

          जन्म काल में ही निपुत्री ब्राह्मणी के स्तन से भगवान् श्री के पोषण हेतु दुग्ध प्रवाहित होना । शीतला के मंदिर में वर्षा बूंदों के बीच १०४ डिग्री ज्वर से ग्रस्त होते हुए भी जीवित ही नहीं , अपितु नई स्फूर्ति के साथ प्रातः उठकर चले आना तथा उनके संकल्प मात्र से गंध , दुर्गंध उठ जाना , वजन हल्का या अधिक हो जाना , ट्रेन या बस का रुक जाना उन्हें अतिमानवीय सिद्ध करता है ।

          एक सज्जन श्री मिश्रा जी ने दुर्ग निवासी श्री सतीश चंद्राकर को बताया कि उन्होंने अभी एक घंटा पूर्व बालक भगवान् को रायुपर में देखा है , जबकि भगवान श्री पूरे दिन श्री चन्द्राकर जी के यहाँ विराजमान थे । बोरसी वालो ने भी उन्हें एक ही समय में दो ग्रामों में क्रियाकलाप करते हुए अनुभव किया है । दो शरीर धारण कर लेना क्या हैं ?

           शंकर नगर , दुर्ग निवासी श्री छेदी लालजी ने स्वप्न में देखा कि श्री कृष्ण गोपी के साथ परिहास रत हैं , फिर उन्हें कृष्ण के स्थान पर बालक भगवान् उस गोपी के साथ दिखे बार - बार यह दृश्य परिवर्तन होता रहा । उठकर उन्होंने भगवान् श्री से पूछा क्या मैंने स्वप्न में आप और कृष्ण में जो अभिन्नता देखी है - वह सच है ? उत्तर मिला सच है ।

           बोरसी ग्राम में उनके साथ बाल्य काल में जो लोग खेलते थे , उनमें से कुछ आज भी हैं । वे बताते हैं कि बालक भगवान् एक बार हम लोगों को गोल खड़ा कर स्वयं मध्य में खड़े हो गये और हम लोगों को आँख बंद करने को कहा । कुछ देर बाद हम आँखे खोले तब उन्होंने हम लोगों से पूछा क्या देखे ? हम सबको बालक भगवान् के स्थान पर कृष्ण दिख रहे थे । वे बोले- ' बस मैं वही हूँ ' ।

           रायपुर निवासी कृष्णा सेलीकर जी बताते हैं कि वे बालाजी एवं सत्यसाई बाबा धाम यात्रा में गये थे , तब वहां मुझे उनमें बार बार बालक भगवान् ही दिखते थे । ऐसे अनेक भक्तों ने उन्हें हनुमान जी की प्रतिमा में भी देखा हैं । बहुतों का बहुत प्रकार का अनुभव है जो दर्शाता है , या इस सच्चाई ईश्वराधीन है । विश्वास को दृढ़ करता है कि वे निश्चित रूप से ईश्वर के अंशावतार थे ।

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क्या उन्होंने परकाया प्रवेश किया था ?

योग ग्रंथों में परकाया प्रवेश की चर्चा की गई है । कोई योगी अपनी साधना या अधूरे कार्य को पूरा करने के लिये और अधिक दिन इस दुनिया में रहना चाहता है , किन्तु यदि उसकी काया जीर्ण हो गई है , तब वह ऐसे हृष्ट पुष्ट सद्यः मृत ( किसी दुर्घटना या हृदयाघात से ) व्यक्ति के शव की खोज में रहता है , और अवसर पाते ही अपने जीर्णशीर्ण शरीर को त्याग कर उस मृत व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता इसे परकाया प्रवेश कहते हैं ।

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अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका में कुछ वर्ष पूर्व एक ब्रिटिश जनरल - ( जो बंगाल में तैनात था ) की डायरी एक संस्मरण प्रकाशित हुआ था स H लिखा था कि हुगली नदी में बाढ़ में बहते हुए एक नवयुवक की लाश आयी । __ सुनसान स्थान था । झोपड़ी से एक वृद्ध सन्यासी निकला । उसने शव को खींच कर किनारे लाया । जनरल उत्सुकतावश छिपकर यह सब देख रहा था । उसने देखा कि कुछ ही क्षणोपरांत उस लाश में जान आ गई और वृद्ध साधु का शरीर मृत हो गया , जिसे उस समय जीवित नवयुवक ने वृद्ध के शरीर को नदी में बहा दिया । वह जनरल उस साधु के इस चमत्कार को देखकर दाँतों तले उँगली दबा लिया । यह स्पष्टतः परकाया प्रवेश की घटना थी । परकाया प्रवेश की चर्चा आद्य शंकराचार्य के विषय में भी जनमानस में प्रसिद्ध है । शास्त्रार्थ करते हुए आद्य शंकराचार्य महिष्मती ( उज्जैन ) पहुॅचे उस समय वहां मंडन मिश्र नामक भारत प्रसिद्ध उद्भट विद्वान रहते थे , जिसके द्वार पर दो तोते परस्पर शास्त्रार्थ करते रहते थे ।

मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में जब पराजित हो गये तो उसकी विदूषी पत्नी सामने आयी और बोली अभी जब तक आप उनकी अर्धांगिनी , अर्थात मुझे परास्त नहीं कर लेते तब तक मेरे स्वामी को हारा हुआ कैसे कह सकते है श्री शंकराचार्य जी जब उनसे शास्त्रार्थ करने को उद्यत हुए तो उस विदूषी ने काम शास्त्र पर प्रश्न कर दिया । शंकराचार्य जी इससे अनभिज्ञ थे , आजन्म ब्रह्मचारी थे , अतः उन्होंने एक माह का समय मांगा । अपना शरीर एक कुटिया में , अपने शिष्यों के संरक्षण में छोड़कर , उसी समय मृत एक राजा के शरीर में प्रवेश कर काम शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर पुन : अपने शरीर में वापस आये तब शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की पत्नी को परास्त किया । वह घटना भी परकाया प्रवेश का एक उदाहरण है |

अमरकंटक में नर्मदा कुण्ड के मंदिर के ठीक पीछे बर्फानी बाबा का आश्रम है । वे एक सिद्ध संत के रूप में जाने जाते हैं । उनका कहना है । कि वे बर्फाच्छादित हिमालय की किसी कंदरा , में तिब्बत क्षेत्र में अपने लामा गुरु के मार्ग दर्शन में साधनारत थे । उनका शरीर एकदम जीर्ण हो गया था अतः उन्होंने जो शरीर अभी लोगों को दिखाई दे रहा है , उस शरीर में प्रवेश कर पुराने शरीर को बर्फ में दफना दिया वे अपनी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक बताते हैं । बालक भगवान के विषय में भी कुछ लोगों की धारणा है कि उन्होंने परकाया प्रवेश किया है । उनका तर्क है कि जितनी सिद्धि उनके पास थी , वह एक नादान बालक में असंभव है । उनके माता पिता कोई मनु सतरूपा या वासुदेव देवकी के अवतार तो नहीं थे , जिनके कुक्ष में ऐसी देवतुल्य आत्मा का आगमन हो । दुर्ग निवासी श्री सतीश चन्द्राकर की पत्नी उर्वशी देवी बालक भगवान् की अनन्य सेविका थीं । उन्हीं के घर , उनकी गोद में ही बालक भगवान ने अंतिम श्वॉस ली थी ।

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उन्होंने अपने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि- ' मैंने एक बार भगवान श्री से पूछा- मुझे ऐसा लगता है कि जब राधा बाई ने अपने साढ़े चार वर्ष के बालक पूर्णेन्द्र को तीव्र ज्वर की अवस्था में बरसते पानी में , खुले चबूतरे में माँ शीतला के चरणों में रात्रि में छोड़ आयीं , तब निश्चित ही उस बालक के प्राण पखेरू उड़ गये होंगे और इसे उपयुक्त अवसर जान आप ( कोई सिद्ध संत ) अपना जीर्ण शीर्ण शरीर को कहीं त्याग कर इस पूर्णेन्द्र की काया में प्रवेश कर गये होंगे । मैंने पूछा- क्या मेरी कल्पना सच है ? इस पर बालक भगवान् हँस कर मौन रह गये । मेरी बात को नकारा भी नहीं । अतः मुझे ऐसा लगता है कि पूर्णेन्द्र की काया में बालक भगवान् के रूप में लीला करने वाला यह कोई परकाया प्रवेश किया हुआ दिव्य आत्मा ही है । सचाई कौन बताये ?

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