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जन्म अवतरण

बालक भगवान का जन्म अवतरण

मानव कहाँ , किस घर में , किस रूप एवं किस परिस्थिति में जन्म लेता है- इसके संबंध में हमारे दिव्य द्रष्टा , सूक्ष्म जगत के वैज्ञानिक आर्ष ऋषियों ने वृहत प्रकाश डाला है उनके अनुसार हम जहाँ भी जिस परिस्थिति में जन्म लेते हैं वह हमारा चुनाव होता है । इसमें हमारे पूर्वजन्म के कार्य बंधनों का योग तथा हमारे चित्त पर पड़े हुए संस्कार निर्णायक कारक होते हैं ।

ईश्वर अंश जिव अविनाशी |
चेतन , अमल , सहज सुख राशि ||

गीता में अर्जुन से भगवान कृष्ण ने कहा है-
ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशे तिश्ठति

मानव कहाँ , किस घर में , किस रूप एवं किस परिस्थिति में जन्म लेता है- इसके संबंध में हमारे दिव्य द्रष्टा , सूक्ष्म जगत के वैज्ञानिक आर्ष ऋषियों ने वृहत प्रकाश डाला है उनके अनुसार हम जहाँ भी जिस परिस्थिति में जन्म लेते हैं वह हमारा चुनाव होता है । इसमें हमारे पूर्वजन्म के कार्य बंधनों का योग तथा हमारे चित्त पर पड़े हुए संस्कार निर्णायक कारक होते हैं ।

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मृत्यु के समय जीवात्मा पंचभूत स्थूल शरीर को तो त्यागती है , पर उसके साथ सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर विद्यमान रहते है । इन्हीं में हमारे जीवन भर के किये गये शुभ या अशुभ कार्यो के फल बीज रूप में संचित रहते हैं , उन्हीं के अनुसार हमारी सूक्ष्म बुद्धि निर्मित होती है , जो आगामी जन्म के लिये अपने माता - पिता एवं परिस्थितियों का चयन करती है ।

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हिटलर , मुसोलिनी या जनरल डायर की आत्मा को यदि जन्म लेना होगा तो उसकी आत्मा को किसी ऐसे माता पिता का चयन करना होगा जो कई पीढ़ियों एवं कई जन्मों से क्रूर कार्यरत हों , किसी कट्टी घर में कसाई खाने में काम करते हों , क्योंकि उन आत्माओं के संस्कार तो क्रूरता के हैं , वे भला शुभ परिवार का कैसे चयन कर सकते हैं ?

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वैसे ही राम , कृष्ण , बुद्ध , महावीर की आत्मा को जन्म लेने के लिये कोई मनु सतरूपा या ऐसे ही कोई जनक जननी को खोजना पड़ेगा जो जन्म जन्मों से तपस्यारत हो , शुभकार्यो में जुटे हुए हों । इसीलिये किसी द्विव्य अवतारी और महान क्रूर आत्माओं का जन्म बहुत दिनों बाद होता है , क्योंकि उन्हें उनके संस्कार के अनुकूल गर्भ बड़ी कठिनाई से ही उपलब्ध होता है ।

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इस दृष्टि से देखें तो हम अपने वर्तमान जन्म के आधार पर प्रायः अपने विगत जन्म का आकलन कर सकते है । बालक भगवान् जिस जनक जननी के घर आये उनका इतिहास उनका कर्म बड़ा पुनीत था , वह परिवार सभ्य , सुसंस्कृत , धर्मशील और सरल व विनम्र था , शहर की कुटिलताओं से दूर सुदूर ग्रामांचल के निवासी कृषक परिवार का चयन बालक भगवान ने किया , क्योंकि हमारे वर्तमान जीवन को न केवल हमारे पूर्वार्जित कर्म , संस्कार ही प्रभावित करते हैं , अपितु इस जन्म के माता पिता के विचार , परिवार एवं परिवेश भी पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं । हम वहीं से अपना वर्तमान जीवन प्रारंभ करते हैं , जहाँ तक हम पिछले जन्म में पहुँच चुके थे । विकास बाद का सिद्धान्त भी यही प्रमाणित करता हैं हम सतत विकास - मान हैं हमारी गति जाने अनजाने ईश्वर सानिध्य की ओर ही गतिशील है यह हमारे आर्ष ऋषियों का अनुभूत सिद्धान्त है ।

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जन्म से ही बालक भगवान् विलक्षण थे , दिव्य थे , जिसका अनुभव उनके संपर्क में आने वाले , उनकी करूणा से लाभान्वित होने वाले लोगों ने किया और उन्हें बालक भगवान के उच्चतमपद से विभूषित किया । इससे उनके पूर्व जन्म का स्पष्ट आभास होता है कि वे पूर्व जन्म के एक सिद्ध संत थे , जो किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु पुनः अवतीर्ण हुए थे |

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यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड , उसके ग्रह पिंड , तारे , प्राणी और पदार्थ एक वृत्त में तीव्र गति से चलायमान हैं जहाँ से वे चले है , वहीं पुनः पहुँचना उनकी इस गति का एक मात्र लक्ष्य हैं । हम देखते हैं कि जल समुद्र से वाष्पित होकर बादल के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ करता है । वह बरसता है और किसी नाले नदी के सहारे पुनः समुद्र में पहुँच जाना चाहता है । कभी किसी मरू में बादल बरस पड़ता हैं तो पुनः वाष्पित होकर बादल बनता और बरसता है । समुद्र ही उसका अंतिम लक्ष हैं ।

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कोई धातु भूगर्भ से खान से निकलता है कोई औजार या आभूषण बन जाता है । वह घिसता है , उसका क्षरण होता है । उसके कण भूमि पर बिखरते हैं और अपने भूमिगत खान की ओर सजातीय चुंबकीय आकर्षण से बंधे हुए वे अपने खदान की ओर खिचें चल पड़ते है । उनके इसी गुण के कारण कोई भूगर्भ शास्त्री खदान का पता पाता है । जिस दिशा में कोई धातु के कण भूमि में अधिक मिलते है उसी दिशा में खोज करते हुए वैज्ञानिक उसके खदान तक पहुँच जाते है ।

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इस सिद्धान्त के अनुसार जब जीवों की यात्रा पर दृष्टिपात करते हैं तो जीव का अंतिम लक्ष ईश्वर ही सिद्ध होता है । सृष्टि की कहानी वेदों में जो वर्णित हैं उसके अनुसार जब कहीं कुछ नहीं था सिवाय शून्य के तो ब्रह्म में स्फूरणा हुई - " एको ऽहम बहुस्यामि ” अर्थात् मैं एक हूँ , अनेक में परिवर्तित हो जॉऊ । ब्रह्म के इस संकल्प के साथ ही इस सृष्टि की रचना हुई अतः यहाँ जो कुछ भी जीव या जगत विद्यमान है वह ब्रह्म का ही परिवर्तित स्वरूप हैं इससे यह सिद्ध होता है कि हम ( जीव ) ईश्वर के ही अंश है । रामचरितमानस में संत तुलसी ने इसी सत्य का उद्घाटन करते हुए कहा है ।


ईश्वर अंश जीव अविनाशी ।
चेतन , अमल , सहज सुख राशी ।।
गीता में अर्जुन से भगवान् कृष्ण ने कहा है -
“ ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशे तिश्ठति ”

अर्थात् मानव काया में जीव के रूप में ईश्वर ही विराजमान हैं । अर्थात् हम ( जीव ) ईश्वर के अंग है , अतः उपरोक्त ऋषि प्रणीत सिद्धान्तानुसार हमारा जन्म ईश्वर से हुआ है । ईश्वर से ही हमारी यात्रा प्रारंभ हुई है और ईश्वर में ही विलीन हो जाना हमारी यात्रा का चरम बिन्दु है । माया के वशीभूत होकर भले ही हम कुछ काल के लिए भटक जायें , पर जाने अनजाने हमें ब्रह्म की ओर ही गतिशील होना है , हो रहे हैं । माया हमें भटकाती है । भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा है -
" मम माया दुरत्यया " - मेरी माया अत्यन्त कठिन है ।

पाठशाला जाते समय जैसे कोई बालक रास्ते में मदारी के तमाशें में बन्दर नाच में उलझ कर भटक जाता है , वैसे ही हम भी माया के वशीभूत हो कई जन्मों तक भटकते रहते है । धन्य हैं वे जो परमेश्वर की इस दुस्तर माया को बेथ कर अपने लक्ष की ओर बढ़ते रहते हैं । बालक भगवान इस दृष्टि से उन पूज्य आत्माओं , महात्माओं में से है , जिन्हें माया भटका नहीं पाती न पथ से विचलित नहीं कर पाती है । तभी तो बालक भगवान ६ वर्ष की आयु से ही गृह त्यागकर अकिंचन , अनिकेतन यायावर जीवन को गले लगाते हुए , माया , मोह , परिवार , द्रव्य , यश आदि से जल में कमलवत रह कर परिव्राजक जीवन यापन करते हुए दरिद्रनारायण दीन दुखी के रूप में उनके समक्ष उपस्थित प्रभु की सेवा साधना में दत चित्त हो लगे रहे ।

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धान कटोरा कहे जाने वाले , खनिज संपदा से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अन्तर्गत धमधा अंचल के पथरिया ग्राम में निवास करने वाले सरल प्रकृति के कृषक परिवार को अपने जन्म के लिये बालक भगवान की दिव्य आत्मा ने चुना । वहाँ मारकंडेय नामक एक स्वर्णकार , कुलोद्भव धर्मप्राण , चरित्रवान , अनुशासन प्रिय सज्जन निवास करते थे । ये पूरे ग्राम को अपना कुटुंब ही मानते थे । किसी भी व्यक्ति का दुख दर्द उनका दुखदर्द होता था । यथाशक्ति उनके दर्द निवारण के उपाय में जुट जाते थे । उनके पुत्र थे श्री रामेश्वर प्रसाद जी पोद्दार । ये भी अपने पिता के अनुरूप सज्जन , सुहृदय एवं सुकोमल स्वभाव के विनम्र देव मानव थे । इन्हें ही बालक भगवान् ने इस जन्म के अपने जनक रूप में चुना । बालक भगवान की दादी का नाम कचरी बाई था । ये भोली भाली ग्रामीण , सरल चित्त महिला थी । अतिथि को मॅगन ( भिखारियों को देव रूप मानकर उन्हें भोजन , भिक्षाटन देना - इनका नित्य कर्म था । “ अतिथि देवो भवः " की ये उपासिका थीं ।

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बालक भगवान के पिता श्री रामप्रसाद जी की प्रथम जीवन संगिनी के असमय आकस्मिक निधन से वे भग्न हृदय हो उठे । उन्होंने दूसरी शादी राधा बाई से किया इन्हें ही बालक भगवान का जन्म देने का श्रेय मिला । ये भी अशिक्षित सरल किन्तु अत्यन्त धर्मप्राण भारतीय नारी थीं । श्री रामेश्वर प्रसाद जी का मन कृषि कर्म से विरत हो उठा था । रायपुर महानगर के पुरानी बस्ती में उनका एक जीर्णशीर्ष मकान था । पथरिया को छोड़कर ये यहाँ निवास करने लगे थें । यहाँ बालक भगवान का जन्म २६ नवम्बर १६२८ ईश्वी को ऊषा बेला में तीन बजकर पैंतीस मिनट पर हुआ । इधर नभमंडल को भगवान भुवन भास्कर अपनी स्वर्णिम किरणों से रंजित कर रहे थे । स्वागत में खगकुल चूँ चूँ की ध्वनि करते हुए नवागत दिव्यात्मा की विरुदावली गायन कर रहे थे । मंदिरों में घंटे झाँझ , मंजीरे और शंख निनादित हो रहे थे , जैसे इस बालक के आगमन के स्वागत में यह सब आयोजन हो रहा हो । पूर्णिमा की शुभ तिथि थी । बालक भगवान ने अपने आगमन के लिये बड़ा ही पुनीत ब्रह्म मुहूर्त को चुना था । शिशु के किहूँ किहूँ ( कहाँ कहाँ ) के मधुर ध्वनि माता के कर्ण कुहरों को हर्ष विभोर कर गई ।

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पिता अपने प्रिय पुत्र के वैभव को देखने के लिये अधिक दिन तक जीवित नहीं रह पाये । पाँच वर्ष की आयु प्राप्त होने के पूर्व ही बालक को अपने भाग्य पर छोड़कर वे चल बसे । माता का स्वास्थ्य दयनीय था अतः पड़ोस की एक ब्राह्मण महिला ने इस शिशु को अपना स्तनपान करा कर जीवन दान दिया । यह भी एक चमत्कार ही था । वह महिला निपुत्री थी , पर न जाने किस ईश्वरीय चमत्कार से इस बालक को देखते ही उनके स्तन से दुग्ध की धारा बह चली और उन्हें वात्सल्य भाव से दुग्धपान कराया । बालक भगवान इन्हें अपनी दूसरी माता के नाम से पुकारते थे । माता भी अधिक दिन तक अपने आँचल की छाँव बालक को नहीं दे पायी , छः वर्ष की आयु होते होते वे भी प्रभु को प्यारी हो गई , ऐसा कष्ट मय इनके जीवन का प्रारंभ था ।

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जन्म का दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष पूर्णिमा श्री राधा वृषभान दुलारी की महारास की पावन रात्रि थी । ऐसा संकेत देता है । यह दिन P -- जैसे कृष्ण की विरहणी अपनी प्रेमाराध्या से पुनर्मिलन को आविर्भूत हुए हों । बालक भगवान की लीला से ( जिसका वर्णन आगामी पृष्ठों में किया जायगा ) यह स्पष्ट संकेत मिलता है , कि वे कृष्ण के अशावतार ही थे । जीवन रहस्मय है एवं सहज विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता । पाठक उनकी लीला को पढ़कर स्वयं निर्णय लें । विषय श्रद्धा और विश्वास का है । उनके बाह्य व्यवहार से वे निपट बालक थे , किन्तु अनन्त विभूतियों के आगार होने से , भगवत्ता से सराबोर होने से भगवान ही थे । अतः उनका नाम- बालक भगवान बड़ा सार्थक और सटीक हैं । निःसंदेह ।

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